जिस आँगन में हमने जनम लिया , जिस आँगन में हम पले-बड़े
उस आँगन को हम भूल चुके , जिस आँगन में हम खेले कूदे ;
जिस आँगन में सपने देखे , जिस आँगन में अपने देखे
उस आँगन को हम छोड़ चले , किसी अँधेरे कोने में ;
जिस आँगन ने हमको सींचा , जिस आँगन से हमने सीखा
उस आँगन को बाँट दिया, हमने अनेकों टुकड़ों में ;
जिस आँगन में देखी अमृत वृष्टि ,
उसी आँगन में आज देख रहे हैं बम के ओलों को ;
जिस आँगन में राजनीति को जीवन दर्शन बतलाया था ,
लेकिन आज वही राजनीति बन गई है , साधन जीने का ;
जिस आँगन में कर्म प्रधान समझाया था , धर्मं मानवता सिखलाया था
आज उसी आँगन में काम कराने के लिए देना पड़ता है उत्कोच ,ऐसा करते हुए हम नहीं करते हैं तनिक भी संकोच ;
जिस आँगन में ममता पाई, जिस आँगन में समता पाई आज उसी में घोल रहे हैं , बर्बरता और विषमता बड़ी चतुराई से ;
जिस आँगन को हमने पूजा ,जिस आँगन को जग ने पूजा
आज चंद लुटेरे उस आँगन को ,लूट रहे हैं बड़ी सफाई से ;
जिस आँगन पर नाज था कभी विधाता को
आज उसकी क्या हालत, तुम बना रहे हो !
जिस आँगन में कभी फूल खिला करते थे
आज वहीँ तुम कांटे उगा रहे हो ;
एक बार पूछो अपने हृदय से तुम
क्या यही पारितोषिक है उस सृष्टि का , जिसमें हम-तुम सबने जनम लिया ?

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