शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

क्या ले कर आया था ,क्या ले कर जा रहा हूँ मैं ...

खट्टी-मीठी यादों की सौगात ले कर जा रहा हूँ मैं 
कुछ आम ,कुछ-खास ले कर जा रहा हूँ मैं 
शिक्षकों की डांट-फटकार और दोस्तों का प्यार ले कर जा रहा हूँ मैं 
गुरुओं का ज्ञान और उनके विचार ले कर जा रहा हूँ मैं 
खाली हाथ आया था ,अब बहुत कुछ साथ ले कर जा रहा हूँ मैं ...

वो proxy के msg की लम्बी list ले कर जा रहा हूँ मैं
वो exam रात की पढाई और submissions deadline पर submit  करने की कला ले कर जा रहा हूँ मैं 
fail होने की आशंका पर दोस्तों की सांत्वना का इकरार ले कर जा रहा हूँ मैं 
कभी अच्छे marks आ जाने पर दोस्तों की पार्टी-पार्टी की पुकार ले कर जा रहा हूँ मैं 
खाली हाथ आया था ,अब ज्ञान,मान-सम्मान और आप सब का  प्यार ले कर जा रहा हूँ मैं...

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

अंत बहुत पछतायेगा ...



ऐ आतंक के पुजारी !
अभी समय है मति बदल ले ,नहीं अंत बहुत पछतायेगा ...

एक दिन ऐसा आएगा 
उस मौला के कोर्ट में, तुझे बुलाया जायेगा 
जब तेरे पापों का केस चलेगा ,पर तू वकील भी न कर पायेगा !

तब तेरा काला चिट्ठा खोला जायेगा ,
वह कागज भी खुद को ठगा हुआ ही पायेगा
न तेरा कोई तर्क चलेगा ,न तू सतर्क रह पायेगा !

न तो तेरी बंदूक रहेगी ,तो गोली कहाँ से चलाएगा 
न तेरे पास बारूद रहेगा ,तो मिसाइल कैसे चलाएगा !

वहाँ कैसे तू बम फोड़ेगा ,क्यूंकि वहां तो तू नंगा ही जायेगा !
अभी समय है मति बदल ले ,नहीं अंत बहुत पछतायेगा ...

क्या खोया क्या पाया तूने,अंत में तुझसे पूछा जायेगा
तूने तो है ज़हर फैलाया ,तो तुझे सांप सूंघ जायेगा !

अंत काल जब आएगा ,बस एक फ़रमान सुनाया जायेगा
तू मानव नहीं है ,तो बस एक दानव ही कहलायेगा !

खुद का होता खून देख ,तेरा होश ठिकाने आएगा
तब तक बहुत देर हो चुकी ,तू तो बस पछतायेगा !

और मरने के बाद भी ,तू तो आतंकी ही कहा जायेगा
जब तूने है बबूल उगाया, तो आम कहाँ से पायेगा !

 अभी समय है मति बदल ले ,नहीं अंत बहुत पछतायेगा ...

बुधवार, 7 सितंबर 2011

मोमो-पथ

रविवार की दोपहर को मैं और मेरे दो दोस्तों ने सलुआ(मोमो स्थल) जाने की योजना बनाई| तो शाम छः बजे जाना तय हुआ |जैसे-तैसे मैंने एक दोस्त से मोटरसाईकिल का इन्तेजाम किया |हम तीनों बेपरवाह होकर मोटरसाइकिल पे सवार अपनी यात्रा को निकल पड़े (चूँकि आईआईटी परिसर में मोटरसाईकिल चलाना अवैध है इसीलिए बेपरवाह शब्द का प्रयोग किया है :P ) |एक तो वह मोटरसाइकिल पहले ही अपनी उम्र प्राप्त करने के करीब पहुँच चुकी थी और ऊपर से उसके हाथ-पैर भी ढंग से कार्य नहीं कर रहे थे |इन सभी परिस्थितियों को मद्देनज़र रखते हुए तीनों की जान की जिम्मेदारी का पूरा बोझ चालक के कन्धों पर आ पड़ा था |और ऐसी विकट  परिस्थिति में चालक की जिम्मेदारी दी गई थी सबसे अनुभवी(हम तीनों में )/अनुभवहीन(मात्र एक-दो दफ़ा) जो बदकिस्मती से मैं स्वयं ही था |

हम आईआईटी के सुरक्षा घेरे को तोड़ते हुए प्रेम-बाज़ार गेट से बाहर निकले |यहाँ से हमारा वास्तविक सफ़र शुरू हुआ |नितीश उर्फ़ अल्टी ने मोमो-खान के लिए रुपया उत्सर्जन यन्त्र से रूपये निकाले |उसके बाद जैसे ही मैंने मोटरसाइकिल को चालू करके आगे की ओर प्रस्थान किया ,तो एक खौफनाक मंज़र हमारा इंतज़ार कर रहा था | सामने से एक विशालकाय बस आते हुए दिखी और हमारी मोटरसाइकिल उसको टक्कर मारने ही वाली थी (क्यूंकि बूढ़ी होने के कारण उसके हाथ-पैर पहले ही जवाब दे चुके थे एवं उसके दांत भी नहीं चमक रहे थे ) कि मैंने उसे एक स्थिर मारुति और उस दौड़ती बस के बीच में से निकालते हुए सड़क मार्ग से नीचे उतारा |उस समय हमारी सांसे मोटरसाइकिल के पैरों में अटकी हुई थीं |लेकिन आनंदजी अपनी अंतिम आनंदमयी यात्रा(उस समय की सोच के अनुसार)  में कुछ ज्यादा ही आनंदित हो गये और मोटरसाइकिल पर ही गुदगुदी करने लगे |इस हरकत को देखकर मेरा पारा मोटरसाइकिल की गति से भी तेज बढ़ने लगा |जैसे-तैसे हमारी जान बची और हमने सोचा "जान बची तो लाखों पाए " ...

फिर आसमान की और निगाह दौड़ाई तो तारों को देख कर हमें अपने जीवित रहने का एहसास हुआ |तदुपरांत गगन की गोद में प्रजव्वलित तारों की रोशनी के सहारे से हमारी सवारी उस अंधकारमय मोमो-पथ को पार करती हुई अपने अंतिम पड़ाव स्थल सलुआ पहुंची |वहां हमने मोमो का रसास्वादन किया |वहां के सौंदर्य दृश्य को देखकर हमें नयन-सुख प्राप्त हुआ |इस तरह हम अपनी रोमांचकारी-खौफ़नाक मोमो-पथ यात्रा को समाप्त कर अपनी बूढ़ी मोटरसाइकिल पर सवार छात्रावास की ओर लौट आये...

रविवार, 20 मार्च 2011

चाँदनी रात...

चाँदनी रात में बदल घने थे ,चन्द्रमा प्रदीप्त हो रहा था 
चन्द्रमा अपनी रोशनी से दूसरों को रोशन कर रहा था ,
चाँदनी दूसरों की रोशनी से खुद का सुहाग रोशन करना चाह रही थी 
चाँदनी का सुहाग चंदा मिटने के बहुत करीब था 
वह ज्वर की लहरों के थपेड़ों को नहीं झेल पा रहा था 
चाँदनी कुछ पैसों के लिए ठाकुर के पास दौड़ गई थी 
किन्तु ठाकुर ने चाँदनी की सुन्दरता का हरण कर लिया था 
चाँदनी पैसों से औषध लेकर आई और घर की ओर दौड़ी जा रही थी 
लेकिन उसने बहुत देर कर दी थी... 
तब तक चंदा उसे अलविदा कह कर आकाश की ओर पलायन कर चुका था 
हाय रे ! मेरे विधाता !!
चाँदनी अपना शरीर दान कर भी चंदा को जीवन दान नहीं दे पाई 
चन्द्रमा मूकदर्शक बन कर , चेहरे पर झूंठी मुस्कान के साथ सूर्य का स्वागत करने अपने द्वार पर आ चुका था ...

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

वो कागज की कश्ती , वो बारिश का पानी...

                                                                   वो कागज की कश्ती , वो बारिश का पानी...
                                                                                        
                                                                   वो बाजरे की रोटी ,सरसों का साग 
                                                                   वो गर्मी में सूरज की तपती हुई आग!


वो चोर-सिपाही ,लुका-छिपी का खेल,
अब नहीं होता है इनका कहीं पर भी मेल ,
अब तो आ गये हैं ऑरकुट,फेसबुक ,ट्विटर और ई-मेल,
इनकी वजह से होता है कई लोगों का हार्ट फेल!


वो पिताजी का प्यार और माँ का दुलार,
वो बहिन का स्नेह और भाई का करार ,
वो हमारी ट्रेन की रफ़्तार और भीडू का ऐतबार ,
अब नहीं होता इनका कहीं पर भी इकरार !


वो नदी का शीतल जल, रमणीय किनारा
वो ठंडी-ठंडी हवा के मधुमय हिलोंरे ,
आज भी आते हैं मुझे उसी की याद के झोंके ,
लेकिन अब तो डर रहता है कहीं होना जाये किसी के साथ धोके !


                                                                 वो बेमतलब किसी के कान के नीचे बजाना,
                                                                 वो बिना किसी बात के हँसना-हँसाना ,
                                                                 वो कागज की कश्ती , वो बारिश का पानी...
वो भीडू से कुट्टी , वो दुश्मन की छुट्टी
वो द्रविड़ के चौके, वो सचिन के छक्के
वो भगवान के दर्शन ,वो नट का प्रदर्शन
वो कागज की कश्ती , वो बारिश का पानी...


वो स्कूल में लड़कियों को चिड़ाना,
वो मास्साब से डांट खाना ,
वो तरबूजों की चोरी ,वो गाँव की गोरी
वो कागज की कश्ती , वो बारिश का पानी...


वो कागज की कश्ती , वो बारिश का पानी
वो पहाड़ की चढाई , वो स्लेट की पढाई
वो ऊंट की सवारी , वो खेत की क्यारी
लेकिन अब नहीं आती इनकी कभी बारी!!


                                                              वो कागज की कश्ती , वो बारिश का पानी...




शब्दार्थ:-
भीडू = दोस्त
कुट्टी = मन-मुटाव
नट = नर्तक
मास्साब = अध्यापक 

शनिवार, 25 सितंबर 2010

" माँ "


                                         जीवन हमें मिलता है  जिनसे 
                                         उस देवी को हम कहते हैं माँ !

                                         कदमों में है जिनके स्वर्ग बसा 
                                         बाहों  में जिनके प्यार भरा 
                                         हृदय में जिनके प्रेम चला 
                                         आँखों में जिनके स्नेह रखा 
                                         उस देवी को हम कहते हैं माँ !

                                        प्रथम गुरु वो बन कर 
                                       सब कुछ हैं वो हमें  पढ़ाती,
                                       ममत्व वो हम पर बरसाती
                                       अपनत्व वो हम पर दिखलाती  
                                       चलना वो हमें  सिखलाती 
                                       संस्कार वो हमें समझाती
                                       भले-बुरे कि सीख बताती 
                                       खुद गीले में सो कर भी 
                                       हमें सूखे में सुलाती ,
                                       खुद भूखे रह कर भी 
                                       हमें खाना खिलाती , 
                                       लोरी गा-गाकर वो हमें नींद दिलाती 
                                       हमेशा हमें पिताजी की डांट से बचाती 
                                       हमारी ख़ुशी में फूली नहीं समाती 
                                       हमारे दु:ख में व्याकुल हो जाती 
                                       और हमारे घावों पर स्नेह लेप लगाती 
                                       पूर्णिमा में हमें चाँद दिखलाती 
                                       अमावस्या से वो हमें बचाती 
                                       इस संसार की निर्ममता से हमें सुरक्षित रखती 
                                       इस जग के सौंदर्य से हमे परिचित कराती 
                                       उस देवी को हम कहते हैं माँ !

                                       उनके समकक्ष है ना कोई खड़ा 
                                       उनका जीवन है अपनों के लिए बना 
                                       उस देवी को हम कहते हैं माँ 
                                       उनके लिए न्यौछावर है हमारी जाँ !!

सोमवार, 20 सितंबर 2010

"आँगन " or "सृष्टि "



जिस आँगन में हमने जनम लिया , जिस आँगन में हम पले-बड़े
उस आँगन को हम भूल चुके   , जिस आँगन में हम खेले कूदे ;


जिस आँगन में सपने देखे , जिस आँगन में अपने देखे 
उस आँगन को हम छोड़ चले , किसी अँधेरे कोने में ;


जिस आँगन ने हमको सींचा , जिस आँगन से हमने सीखा  
उस आँगन को बाँट दिया, हमने अनेकों टुकड़ों में  ;




जिस आँगन में देखी अमृत वृष्टि ,
उसी आँगन में आज देख रहे हैं बम के ओलों को ;


जिस आँगन में राजनीति को जीवन दर्शन बतलाया था ,
लेकिन आज वही राजनीति बन गई है , साधन जीने का ;


जिस आँगन में कर्म प्रधान समझाया था , धर्मं मानवता सिखलाया था 
आज उसी आँगन में काम कराने के लिए देना पड़ता है उत्कोच ,ऐसा करते हुए हम नहीं करते हैं तनिक भी संकोच ;




जिस आँगन में ममता पाई, जिस आँगन में समता पाई 
आज उसी में घोल रहे हैं , बर्बरता और विषमता बड़ी चतुराई से ;


जिस आँगन को हमने पूजा ,जिस आँगन को जग ने पूजा 
आज चंद लुटेरे उस आँगन को ,लूट रहे हैं बड़ी सफाई से ;


जिस आँगन पर नाज था कभी विधाता को 
आज उसकी क्या हालत, तुम बना रहे हो !


जिस आँगन में कभी फूल खिला करते थे 
आज वहीँ तुम कांटे उगा रहे हो ;




एक बार पूछो अपने हृदय से तुम 
क्या यही पारितोषिक है उस सृष्टि  का , जिसमें  हम-तुम  सबने जनम लिया ?