गुरुवार, 8 सितंबर 2011

अंत बहुत पछतायेगा ...



ऐ आतंक के पुजारी !
अभी समय है मति बदल ले ,नहीं अंत बहुत पछतायेगा ...

एक दिन ऐसा आएगा 
उस मौला के कोर्ट में, तुझे बुलाया जायेगा 
जब तेरे पापों का केस चलेगा ,पर तू वकील भी न कर पायेगा !

तब तेरा काला चिट्ठा खोला जायेगा ,
वह कागज भी खुद को ठगा हुआ ही पायेगा
न तेरा कोई तर्क चलेगा ,न तू सतर्क रह पायेगा !

न तो तेरी बंदूक रहेगी ,तो गोली कहाँ से चलाएगा 
न तेरे पास बारूद रहेगा ,तो मिसाइल कैसे चलाएगा !

वहाँ कैसे तू बम फोड़ेगा ,क्यूंकि वहां तो तू नंगा ही जायेगा !
अभी समय है मति बदल ले ,नहीं अंत बहुत पछतायेगा ...

क्या खोया क्या पाया तूने,अंत में तुझसे पूछा जायेगा
तूने तो है ज़हर फैलाया ,तो तुझे सांप सूंघ जायेगा !

अंत काल जब आएगा ,बस एक फ़रमान सुनाया जायेगा
तू मानव नहीं है ,तो बस एक दानव ही कहलायेगा !

खुद का होता खून देख ,तेरा होश ठिकाने आएगा
तब तक बहुत देर हो चुकी ,तू तो बस पछतायेगा !

और मरने के बाद भी ,तू तो आतंकी ही कहा जायेगा
जब तूने है बबूल उगाया, तो आम कहाँ से पायेगा !

 अभी समय है मति बदल ले ,नहीं अंत बहुत पछतायेगा ...

बुधवार, 7 सितंबर 2011

मोमो-पथ

रविवार की दोपहर को मैं और मेरे दो दोस्तों ने सलुआ(मोमो स्थल) जाने की योजना बनाई| तो शाम छः बजे जाना तय हुआ |जैसे-तैसे मैंने एक दोस्त से मोटरसाईकिल का इन्तेजाम किया |हम तीनों बेपरवाह होकर मोटरसाइकिल पे सवार अपनी यात्रा को निकल पड़े (चूँकि आईआईटी परिसर में मोटरसाईकिल चलाना अवैध है इसीलिए बेपरवाह शब्द का प्रयोग किया है :P ) |एक तो वह मोटरसाइकिल पहले ही अपनी उम्र प्राप्त करने के करीब पहुँच चुकी थी और ऊपर से उसके हाथ-पैर भी ढंग से कार्य नहीं कर रहे थे |इन सभी परिस्थितियों को मद्देनज़र रखते हुए तीनों की जान की जिम्मेदारी का पूरा बोझ चालक के कन्धों पर आ पड़ा था |और ऐसी विकट  परिस्थिति में चालक की जिम्मेदारी दी गई थी सबसे अनुभवी(हम तीनों में )/अनुभवहीन(मात्र एक-दो दफ़ा) जो बदकिस्मती से मैं स्वयं ही था |

हम आईआईटी के सुरक्षा घेरे को तोड़ते हुए प्रेम-बाज़ार गेट से बाहर निकले |यहाँ से हमारा वास्तविक सफ़र शुरू हुआ |नितीश उर्फ़ अल्टी ने मोमो-खान के लिए रुपया उत्सर्जन यन्त्र से रूपये निकाले |उसके बाद जैसे ही मैंने मोटरसाइकिल को चालू करके आगे की ओर प्रस्थान किया ,तो एक खौफनाक मंज़र हमारा इंतज़ार कर रहा था | सामने से एक विशालकाय बस आते हुए दिखी और हमारी मोटरसाइकिल उसको टक्कर मारने ही वाली थी (क्यूंकि बूढ़ी होने के कारण उसके हाथ-पैर पहले ही जवाब दे चुके थे एवं उसके दांत भी नहीं चमक रहे थे ) कि मैंने उसे एक स्थिर मारुति और उस दौड़ती बस के बीच में से निकालते हुए सड़क मार्ग से नीचे उतारा |उस समय हमारी सांसे मोटरसाइकिल के पैरों में अटकी हुई थीं |लेकिन आनंदजी अपनी अंतिम आनंदमयी यात्रा(उस समय की सोच के अनुसार)  में कुछ ज्यादा ही आनंदित हो गये और मोटरसाइकिल पर ही गुदगुदी करने लगे |इस हरकत को देखकर मेरा पारा मोटरसाइकिल की गति से भी तेज बढ़ने लगा |जैसे-तैसे हमारी जान बची और हमने सोचा "जान बची तो लाखों पाए " ...

फिर आसमान की और निगाह दौड़ाई तो तारों को देख कर हमें अपने जीवित रहने का एहसास हुआ |तदुपरांत गगन की गोद में प्रजव्वलित तारों की रोशनी के सहारे से हमारी सवारी उस अंधकारमय मोमो-पथ को पार करती हुई अपने अंतिम पड़ाव स्थल सलुआ पहुंची |वहां हमने मोमो का रसास्वादन किया |वहां के सौंदर्य दृश्य को देखकर हमें नयन-सुख प्राप्त हुआ |इस तरह हम अपनी रोमांचकारी-खौफ़नाक मोमो-पथ यात्रा को समाप्त कर अपनी बूढ़ी मोटरसाइकिल पर सवार छात्रावास की ओर लौट आये...