गुरुवार, 8 सितंबर 2011

अंत बहुत पछतायेगा ...



ऐ आतंक के पुजारी !
अभी समय है मति बदल ले ,नहीं अंत बहुत पछतायेगा ...

एक दिन ऐसा आएगा 
उस मौला के कोर्ट में, तुझे बुलाया जायेगा 
जब तेरे पापों का केस चलेगा ,पर तू वकील भी न कर पायेगा !

तब तेरा काला चिट्ठा खोला जायेगा ,
वह कागज भी खुद को ठगा हुआ ही पायेगा
न तेरा कोई तर्क चलेगा ,न तू सतर्क रह पायेगा !

न तो तेरी बंदूक रहेगी ,तो गोली कहाँ से चलाएगा 
न तेरे पास बारूद रहेगा ,तो मिसाइल कैसे चलाएगा !

वहाँ कैसे तू बम फोड़ेगा ,क्यूंकि वहां तो तू नंगा ही जायेगा !
अभी समय है मति बदल ले ,नहीं अंत बहुत पछतायेगा ...

क्या खोया क्या पाया तूने,अंत में तुझसे पूछा जायेगा
तूने तो है ज़हर फैलाया ,तो तुझे सांप सूंघ जायेगा !

अंत काल जब आएगा ,बस एक फ़रमान सुनाया जायेगा
तू मानव नहीं है ,तो बस एक दानव ही कहलायेगा !

खुद का होता खून देख ,तेरा होश ठिकाने आएगा
तब तक बहुत देर हो चुकी ,तू तो बस पछतायेगा !

और मरने के बाद भी ,तू तो आतंकी ही कहा जायेगा
जब तूने है बबूल उगाया, तो आम कहाँ से पायेगा !

 अभी समय है मति बदल ले ,नहीं अंत बहुत पछतायेगा ...

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