रविवार, 20 मार्च 2011

चाँदनी रात...

चाँदनी रात में बदल घने थे ,चन्द्रमा प्रदीप्त हो रहा था 
चन्द्रमा अपनी रोशनी से दूसरों को रोशन कर रहा था ,
चाँदनी दूसरों की रोशनी से खुद का सुहाग रोशन करना चाह रही थी 
चाँदनी का सुहाग चंदा मिटने के बहुत करीब था 
वह ज्वर की लहरों के थपेड़ों को नहीं झेल पा रहा था 
चाँदनी कुछ पैसों के लिए ठाकुर के पास दौड़ गई थी 
किन्तु ठाकुर ने चाँदनी की सुन्दरता का हरण कर लिया था 
चाँदनी पैसों से औषध लेकर आई और घर की ओर दौड़ी जा रही थी 
लेकिन उसने बहुत देर कर दी थी... 
तब तक चंदा उसे अलविदा कह कर आकाश की ओर पलायन कर चुका था 
हाय रे ! मेरे विधाता !!
चाँदनी अपना शरीर दान कर भी चंदा को जीवन दान नहीं दे पाई 
चन्द्रमा मूकदर्शक बन कर , चेहरे पर झूंठी मुस्कान के साथ सूर्य का स्वागत करने अपने द्वार पर आ चुका था ...

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